सुखबीर खलीफा बोले जुबानी आश्वासन नहीं लिखित आदेश दिखाओ
12 साल से अंधेरे में रजिस्ट्री और वोटर कार्ड होने के बाद भी नहीं मिल रही बिजली पानी अब आर पार की लड़ाई का ऐलान
पैदल मार्च ने हिला दी सत्ता, किसानों पर FIR के बाद भी नहीं टूटा हौसला
नोएडा, पर्थला पुस्ता पार। यह कहानी सिर्फ बिजली के एक कनेक्शन की नहीं, बल्कि सम्मान, अस्तित्व और नागरिक होने के अधिकार की है। डूब क्षेत्र में बसी कॉलोनियों के करीब लाखों परिवार पिछले 12 साल से एक ही सवाल पूछ रहे हैं – जब हमारे पास जमीन की पक्की रजिस्ट्री है, वोटर लिस्ट में नाम है, आधार कार्ड है, तो हमें बिजली क्यों नहीं मिल रही?

इस अनसुने सवाल का जवाब मांगने के लिए गुरुवार को धरने से उठकर भारतीय किसान परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखवीर खलीफा के नेतृत्व में लाखों किसानों ने पर्थला फ्लाईओवर से सेक्टर-113 थाने तक 4 किलोमीटर का ऐतिहासिक पैदल मार्च पृथला ब्रिज पर पुलिस के उच्च अधिकारियों ने उनको आश्वासन दिया किसी के विरुद्ध भी कोई कार्रवाई नहीं होगी। हाथों में तिरंगा, जुबान पर एक ही नारा – “बिजली हमारा हक है, लिखित में दो।”

12 साल का अंधेरा: कैसे जी रहे हैं ये परिवार?
सेक्टर-63, चोटपुर, छिजारसी और पर्थला पुस्ता पार के इन परिवारों की कहानी सुनकर रूह कांप जाती है। दिन में मेहनत-मजदूरी, रात में अंधेरा। बच्चे मोमबत्ती में पढ़ने को मजबूर, बुजुर्ग गर्मी में तड़प रहे हैं, महिलाओं को पानी भरने के लिए दूर जाना पड़ रहा है।
किसानों का आरोप है कि बिजली विभाग ने कुछ महीने पहले निजी सिंडिकेट के अवैध कनेक्शन काटने के नाम पर पूरे क्षेत्र की लाइट काट दी, लेकिन वैध और स्थायी व्यवस्था नहीं दी। सेक्टर-63 में कुछ लोगों को अस्थायी मीटर दे दिए गए, पर डूब क्षेत्र के गरीबों को छोड़ दिया गया। यह दोहरा मापदंड क्यों?

सुखवीर खलीफा ने सिस्टम को दी खुली चुनौती
मार्च के दौरान किसान नेता सुखवीर खलीफा ने जो कहा, वह हर गरीब की आवाज है। उन्होंने कहा, “हम 6 सितंबर से शांतिपूर्वक धरने पर बैठे हैं। 34 साथी आमरण अनशन पर हैं, 8 बहनों की तबीयत बिगड़ गई, उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। अधिकारी आते हैं, कहते हैं आदेश आ गया है, पर कागज कोई नहीं दिखाता। अब हम झूठे आश्वासन नहीं मानेंगे।”
खलीफा ने दो टूक कहा, “जब तक बिजली विभाग और जिला प्रशासन लिखित में, सरकारी मुहर के साथ आदेश की कॉपी नहीं दिखाएगा कि फलां तारीख से वैध कनेक्शन दिए जाएंगे, तब तक हमारा धरना, हमारा अनशन और हमारा संघर्ष जारी रहेगा। बिजली भीख नहीं, हमारा संवैधानिक अधिकार है।”

FIR की राजनीति: हक मांगने पर मुकदमा?
इस आंदोलन का सबसे काला पहलू यह है कि जब किसान धरने पर बैठे थे, तो सेक्टर-113 थाने की पुलिस ने भारतीय किसान परिषद के अध्यक्ष सुखवीर खलीफा समेत 40 किसानों को नामजद और 200 अज्ञात ग्रामीणों के खिलाफ 13 संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया।
किसान पूछ रहे हैं – क्या अपना हक मांगना अपराध है? क्या 12 साल से अंधेरे में रहने वाले लोगों को धरना देना अपराध माना जाएगा? यह FIR किसानों की आवाज को दबाने का हथकंडा है।
हालांकि, गुरुवार को जब हजारों किसान थाने के घेराव के लिए निकले, तो एडीसीपी मनीषा सिंह को खुद मोर्चा संभालना पड़ा। पर्थला ब्रिज के नीचे पुलिस और बिजली विभाग के अधिकारियों ने किसानों से बातचीत की। पुलिस ने माना कि किसी के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होगी और जांच के बाद FIR में फाइनल रिपोर्ट (FR) लगाई जाएगी।
अब आगे क्या? किसानों की 3 बड़ी मांगें
1. तुरंत लिखित आदेश: अस्थायी नहीं, स्थायी बिजली मीटर लगाने का शासनादेश सार्वजनिक किया जाए और उसकी कॉपी धरना स्थल पर लगाई जाए।
2. FIR वापस हो:
40 किसानों पर दर्ज फर्जी मुकदमा तुरंत वापस लिया जाए, क्योंकि यह आंदोलन को कुचलने की साजिश है।
3. 42 कॉलोनियों का सर्वे:
2023 में शासन ने 40 हजार आबादी वाले क्षेत्रों में सर्वे का आदेश दिया था, जिसमें हज़ारों से ज्यादा परिवारों का सत्यापन हुआ था, उस सर्वे को आधार बनाकर कनेक्शन दिए जाएं।
कानूनी पक्ष भी किसानों के साथ
विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली का अधिकार जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि राज्य की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं दे। ऐसे में 12 साल से बसे परिवारों को बिजली से वंचित रखना सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
फिलहाल, किसानों ने पुलिस के आश्वासन के बाद थाने के घेराव को स्थगित कर दिया है, लेकिन धरना जारी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि लिखित आदेश देखे बिना एक भी किसान घर नहीं जाएगा।
यह लड़ाई अब सिर्फ 42 कॉलोनियों की नहीं, बल्कि पूरे नोएडा के उन गरीब, किसान और मजदूर परिवारों की बन गई है जो सिस्टम की अनदेखी का शिकार हैं।
