गौतम बुद्ध नगर गाजियाबाद। पुलिस की गश्त और पत्रकारिता की चौकसी… दोनों का मकसद समाज को अपराध से बचाना है। लेकिन गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में इसका उल्टा हो रहा है। यहां वर्दी और कलम के एक हिस्से के संरक्षण में नशे का काला कारोबार और देह व्यापार का घिनौना धंधा बेधड़क फल-फूल रहा है। गली-मोहल्ले से लेकर कॉलेजों के गेट तक और हर चौराहे पर खुले मसाज पार्लरों तक… जहर खुलेआम परोसा जा रहा है और सिस्टम आंख मूंदे बैठा है।
कॉलेजों के बाहर बिक रहा भविष्य का जहर
सच्चाई कड़वी है। जनपद के अधिकांश थाना-चौकी क्षेत्रों में सुबह से लेकर देर रात तक गांजा बिक रहा है। निशाने पर युवा हैं, कॉलेज जाने वाले छात्र हैं। गली के नुक्कड़ पर, चाय के खोखे के पीछे, सुनसान पार्कों में पुड़िया थमाई जा रही है। कई बार पकड़े भी जाते हैं, प्रेस नोट में किलो की बरामदगी दिखाई भी जाती है, लेकिन जमीन पर फुटकर बिक्री कभी बंद नहीं होती। क्यों? क्योंकि ऊपर तक हफ्ता बंधा है।
मसाज पार्लर या देह व्यापार का अड्डा?
यही हाल स्पा और मसाज पार्लरों का है। गाजियाबाद और गौतम बुध नगर में हर गली-मोहल्ले के मोड़ पर बोर्ड टंगे हैं। अंदर क्या होता है, ये किसी से छिपा नहीं है। देह व्यापार की मंडी सजी है और इसकी जानकारी थाने से लेकर तथाकथित बड़े अखबारों के दफ्तरों तक सबको है। लेकिन मंथली की हवस ने जमीर को ऐसा जकड़ा है कि कोई बोलने को तैयार नहीं।
कौन है जिम्मेदार?
सवाल पुलिस की ईमानदारी पर नहीं, उसकी नीयत पर है। सवाल पत्रकारिता के उस धड़े पर है जो मंथली लेकर खबरों को दबा देता है। जब रक्षक ही संरक्षक बन जाए तो अपराध क्यों नहीं बढ़ेगा? आज गांजा तस्करी बढ़ रही है, कल यही युवा नशे के लिए लूट और हत्या करेंगे।
अब वक्त आ गया है कि पुलिस कमिश्नर और जिलाधिकारी खुद सड़कों पर उतरकर हकीकत देखें। केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी करने से अपराध नहीं रुकता। उन वर्दी वालों और उन दलाल पत्रकारों को बेनकाब करना होगा जो इस काले धंधे के हिस्सेदार बने हुए हैं। वरना यह धृतराष्ट्र बना प्रशासन इतिहास में अपने ही युवाओं के भविष्य को बर्बाद करने के लिए याद किया जाएगा।
