धर्म अलग, अधिकार समान: लिव-इन रिश्तों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम निर्णय

उत्तर प्रदेश राज्य

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विपरीत धर्म के बालिग जोड़े का बिना शादी किए लिव इन रिलेशनशिप में अपनी मर्जी से रहना किसी कानून में अपराध नहीं है। साथ ही हाई कोर्ट, ट्रायल कोर्ट नहीं है जो उस दशा में यह पता करें कि कोई अपराध हुआ है अथवा नहीं ? जबकि किसी ने एफआइआर या शिकायत दर्ज नहीं कराई हो।

कहा कि बालिगों को संविधान के अनुच्छेद 14,15 व 21 के अंतर्गत समानता व जीवन स्वतंत्रता का मूल अधिकार प्राप्त है। उन्हें अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने अथवा नहीं करने या बिना शादी किए भी लिव इन में रहने का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। विपरीत धर्म के बालिग का साथ रहना कोई अपराध नहीं है, उन्होंने साथ रहने का फैसला लिया है तो जीवन खतरे की आशंका पर उनकी सुरक्षा की मांग क्यों न स्वीकार की जाय।

उक्त टिप्पणियां न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने नूरी व अन्य सहित 12 याचिकाओं को स्वीकार करते की हैं। कुल 12 महिलाओं में सात मुस्लिम हैं जो हिंदू के साथ हैं तो पांच हिंदू हैं जो मुस्लिम पुरुष के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही हैं।

कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि याचियों को किसी से कोई नुकसान होता है तो वे अपनी शिकायत पुलिस अधिकारियों से करें और पुलिस मामले और उनकी उम्र की जांच करे। यदि आरोपों में कोई सच्चाई मिलती है तो पुलिस याचीगण के जीवन, शरीर और आजादी की सुरक्षा के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई करेगी। अगर कोई उनकी मर्जी के खिलाफ या किसी धोखे, जबरदस्ती, लालच, गलत असर या गलत बयानी से उनका धर्म बदलने की कोशिश करता है तो याची रिपोर्ट/शिकायत दर्ज करा सकते हैं, लेकिन किंतु यह आदेश पुलिस अधिकारियों के सामने लंबित किसी भी जांच में रुकावट नहीं डालेगा।

कोर्ट ने कहा, राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह प्रत्येक नागरिक की जीवन सुरक्षा करे। दैहिक स्वतंत्रता को सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। संविधान किसी के साथ धर्म ,जाति ,लिंग, आदि के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है। कोई शादी करें या न करें यह उसकी पसंद है। सहमति से बालिग जोड़े का यौन संबंध बनाना अपराध नहीं है। यदि उनके जीवन को खतरा है तो राज्य का दायित्व है कि वह उनकी सुरक्षा करे।

हालांकि सरकार की तरफ से कहा गया कि याचियों ने धर्म परिवर्तन प्रतिषेध कानून 2021 के उपबंधों का पालन नहीं किया है। इनका कार्य अवैध है। खतरे की आशंका निराधार है। इसलिए सुरक्षा नहीं दी जा सकती। किसी ने खतरे की शिकायत या एफआइआर नहीं की है। बिना धर्म बदले लिव इन रिलेशनशिप में रहना कानून का उल्लघंन है, लेकिन कोर्ट ने इन तर्कों को नहीं माना और कहा कि संविधान नागरिक की सुरक्षा का दायित्व राज्य पर डालता है। कानून का पालन सभी संबंधित अधिकारियों के लिए जरूरी है।

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