देश को बर्बाद कर देगी ‘हड्डी और कुत्तों की राजनीति’

एन0के0शर्मा
वर्तमान समय में देश की राजनीति जिस दिशा में जा रही है, वह बेहद चिंताजनक है। राजनीति की प्राथमिकता कभी जनता की भलाई, विकास और सुधार हुआ करती थी, पर आज यह मूल्यों और आदर्शों से भटक कर स्वार्थपूर्ण समीकरणों की गणना बन गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीति का उद्देश्य समाज को दिशा देना और लोगों के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए, लेकिन आज की राजनीति में यह उद्देश्य कहीं खोता जा रहा है।
हड्डी और कुत्तों की राजनीति एक ऐसा प्रतीक है जो बताता है कि कैसे सत्ता का संघर्ष अब नीति, नीयत और नैतिकता से भटक कर सिर्फ लूट के साधन की होड़ में तब्दील हो गया है। हड्डी सत्ता का प्रतीक है—वह सत्ता, जो आज के नेताओं के लिए सिर्फ व्यक्तिगत और दलगत लाभ का साधन बनकर रह गई है। कुत्ते उन राजनेताओं, दलों और उनके समर्थकों के प्रतीक हैं जो इस सत्ता के लिए आपस में लड़ते हैं, और जनता को इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलता।
राजनीतिक दलों का व्यवहार अब विचारधारा आधारित नहीं रह गया है। एक समय था जब राजनीतिक पार्टियाँ अपनी विचारधारा के लिए संघर्ष करती थीं, और जनता का समर्थन हासिल करने के लिए मुद्दों पर काम करती थीं। आज स्थिति यह है कि राजनीतिक दल अपने स्वार्थ को साधने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। उन्हें न तो समाज की समस्याओं से कोई मतलब है, न ही उनके समाधान से। उनके एजेंडे में सिर्फ एक ही चीज़ प्राथमिक है—सत्ता हासिल करना और उसे बनाए रखना।
जनता, जो लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण होती है, आज मात्र मोहरे बन कर रह गई है। राजनेता चुनावी मौसम में वादों की झड़ी लगाते हैं, लेकिन उन वादों की हकीकत सत्ता मिलते ही धुंधली हो जाती है। चुनावों में जीतने के लिए जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, और भाषा जैसे विभाजक तत्वों का सहारा लिया जाता है। वोट बैंक की राजनीति ने देश की सामाजिक संरचना को बुरी तरह से तोड़-मरोड़ दिया है।
ऐसी राजनीति का दीर्घकालिक परिणाम समाज के लिए बेहद नुकसानदेह है। जब सत्ता का उद्देश्य जनता की सेवा से ज्यादा स्वार्थ सिद्धि बन जाए, तो देश का विकास अवरुद्ध हो जाता है। सत्ता के लालच में नैतिकता और ईमानदारी का ह्रास होता है, और भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी हो जाती हैं। जब तक राजनीति नैतिकता और जनसेवा के मूल्यों से प्रेरित नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र का असली उद्देश्य अधूरा रहेगा।
हड्डी और कुत्तों की यह राजनीति देश के भविष्य को बर्बाद कर रही है। समाज में विभाजन की राजनीति से न केवल सामाजिक ताना-बाना कमजोर हो रहा है, बल्कि आर्थिक असमानता और अन्याय की स्थितियाँ भी बढ़ रही हैं। अगर हम इस प्रवृत्ति को नहीं रोकते, तो वह दिन दूर नहीं जब देश के विकास का सपना मात्र एक भ्रम बनकर रह जाएगा।
