गाजियाबाद पेरेंट्स एसोसिएशन द्वारा जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी (CDO) को संबोधित एक चेतावनी भरा ज्ञापन जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को सौंपा गया। इसमें स्कूलों द्वारा हर साल किताबें बदलने की ‘व्यापारिक नीति’ पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है। जीपीए सचिव अनिल सिंह ने ज्ञापन के माध्यम से मांग उठाई कि शासन प्रशासन व शिक्षा विभाग समस्त स्कूलों को पत्र जारी करें की पठन पठान सामग्री पुस्तकें 5 वर्ष से पहले ना बदली जाए प्रकाशित पुस्तकों का उपयोग स्कूल विशेष में 5 वर्ष तक लागू होना चाहिए।
प्रमुख मुद्दे जो प्रशासन के सामने रखे गए:
अभिभावकों पर अनैतिक आर्थिक बोझ: हर साल स्कूलों की सांठ गांठ से प्रकाशक किताबें बदल देते हैं जिससे स्कूलों व प्रकाशकों को शुद्ध मुनाफाखोरी का लाभ मिलता है। आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावकों पर हर साल हजारों रुपए का अतिरिक्त आर्थिक बोझ झेलने को मजबूर होना पड़ता है।
पर्यावरण को नुकसान लाखों पेड़ों की बलि: नई किताबों की छपाई के लिए हर साल लाखों करोड़ों पेड़ों को काटा जा रहा है। पुरानी किताबें ‘रद्दी’ घोषित करना प्रकृति के खिलाफ अपराध है।
प्रकाशित पुस्तकों का पठन पाठन में 5 वर्ष उपयोग नियम: प्रशासन से मांग की गई है कि “एक पाठ्यक्रम-5 वर्ष” का नियम लागू हो। बिना ठोस कारण किताबें बदलने वाले स्कूलों पर भारी ‘पर्यावरण क्षति शुल्क’ लगाया जाए।
अल्टीमेटम: यदि प्रशासन ने स्कूलों को इस मनमानी को रोकने के लिए आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया, तो अभिभावक सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने पर मजबूर होंगे।
“किताबें शिक्षा व ज्ञान का जरिया हैं, व्यापार का नहीं। हर साल सिलेबस बदलना न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि हमारे पर्यावरण को विनाश कि ओर ले जाता है।”जीपीए आरटीई प्रभारी धर्मेंद्र यादव ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को ज्ञापन सौंपा और अभिभावको की चिंता से अवगत कराया, जिस पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने आश्वस्त किया कि पर्यावरण संरक्षण में ज़िले के स्कूलों को इस गंभीर विषय पर विभाग द्वारा पत्र जारी किया जाएगा।
