सीएम योगी को अपमानजनक ईमेल भेजने के आरोपी को ढाई साल बाद जमानत, 26 गवाहों में सिर्फ 4 से हुई पूछताछ

उत्तर प्रदेश राज्य

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए अपमानजनक बातें लिखकर ई मेल भेजने के आरोपी मुबारक अली की जमानत मंजूर कर ली है। वह इस आरोप में लगभग ढाई साल से जेल में है। यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने दिया है। याची के खिलाफ 2024 में आईपीसी की धारा 153ए, 295ए, 505(2), 504, 419, 420, 467, 468, 471, 120-बी और आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत महराजगंज के भितौली थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी।

एफआईआर के मुताबिक याची ने पुलिस मुखबिर जन्नतुलनिसा के साथ अपना मामला सुलझाने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए अपमानजनक बातों वाला ईमेल भेजा था। याची के वकील ने दलील दी कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया और उसके आपराधिक इतिहास में सिर्फ़ एक ही मुकदमा है। यह भी बताया गया कि अली 20 मार्च 2024 से जेल में बंद है और मुक़दमे की सुनवाई बहुत धीमी गति से चल रही है। सरकारी वकील ने ज़मानत अर्ज़ी का विरोध किया।

23 जुलाई को चार गवाहों से हुई थी पूछताछ

हाईकोर्ट ने मुक़दमे की स्थिति की जानकारी मांगी तो पता चला कि गत 23 जुलाई तक सिर्फ़ चार गवाहों से पूछताछ हुई थी जबकि चार्जशीट के अनुसार 26 गवाहों से पूछताछ होना शेष थी। इन हालात को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि ज़मानत का मामला बनता है तो किसी आरोपी को सिर्फ़ उसके आपराधिक इतिहास के आधार पर जेल में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने माना कि याची के आपराधिक इतिहास के बारे में सही जानकारी दी गई। साथ ही मामले के तथ्यों और परिस्थितियों, दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर विचार करते हुए जेल में बिताई गई अवधि और मुक़दमे की गति को ध्यान में रखते हुए मामले की असलियत पर कोई राय दिए बिना कहा कि याची ने ज़मानत के लिए मामला बना लिया।

जमानत के लिए कोर्ट ने मांगा पर्सनल बॉन्ड

कोर्ट ने जमानत अर्जी मंज़ूर करते हुए कहा कि याची संबंधित अदालत की संतुष्टि के अनुसार पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की दो ज़मानतें जमा करे और उन ज़मानतों का सत्यापन हो जाए। उसे यह भी निर्देश दिया गया कि वह सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करे, गवाहों को डराए-धमकाए नहीं और ज़रूरत पड़ने पर ट्रायल कोर्ट के सामने पेश हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ज़मानत की शर्तों का किसी भी प्रकार का उल्लंघन ज़मानत रद्द करने का आधार बनेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ज़मानत देते समय की गई टिप्पणियां, गवाहों की गवाही के आधार पर स्वतंत्र राय बनाने में ट्रायल जज को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करेंगी।

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