यह विडंबना ही है कि जिस देश को “कृषि प्रधान” कहा जाता है, वहां का किसान आज भी गरीबी, अशिक्षा और अपमान के साये में जीने को मजबूर है। एक ऐसा व्यक्ति जो हर मौसम, हर परिस्थिति में अन्न उपजाकर सबका पेट भरता है, वह खुद भूखा सोने को विवश है। यह स्थिति हमारे समाज और व्यवस्था दोनों पर गहरा सवाल खड़ा करती है।
किसान की गरीबी किसी एक दिन या एक घटना का परिणाम नहीं है। यह दशकों की उपेक्षा और शोषण का नतीजा है। जो किसान हर साल अपनी फसल से दूसरों का जीवन सुरक्षित करता है, उसे अपनी लागत निकालने तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है। खेती की लागत दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है—खाद, बीज, कीटनाशक और पानी की कीमतें आसमान छू रही हैं। इन पर बिजली की बढ़ती दरें और मौसम की बेरुखी अलग से किसान की कठिनाईयों को बढ़ाती हैं।
किसान को सरकारी योजनाओं और नीतियों से लाभ मिलने का वादा तो किया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बहुत अलग है। फसल बीमा योजनाएं कागजों में तो सुनहरी नजर आती हैं, लेकिन जब किसान को इसका वास्तविक लाभ चाहिए होता है, तब उसे केवल दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। दलाल और बिचौलिए इन योजनाओं के नाम पर अपना फायदा कमाते हैं, और किसान फिर से ठगा हुआ महसूस करता है।
किसान की लाचारी केवल आर्थिक समस्याओं तक सीमित नहीं है। शिक्षा और जागरूकता के अभाव में वह अक्सर नई तकनीकों और खेती के आधुनिक तरीकों का उपयोग नहीं कर पाता। जो प्रयास वह करता भी है, उसमें उसे सरकारी विभागों और प्रशासनिक तंत्र का सहयोग नहीं मिलता। कई बार उसके फसल के उचित दाम देने की बजाय उसे नुकसान झेलने के लिए मजबूर किया जाता है।
समाज भी किसान की पीड़ा को अक्सर अनदेखा कर देता है। एक तरफ तो किसान को “अन्नदाता” का दर्जा दिया जाता है, लेकिन दूसरी तरफ उसे निम्न वर्ग का हिस्सा मानकर उसका तिरस्कार किया जाता है। शादियों में, कार्यक्रमों में और सामाजिक समारोहों में किसान को उस इज्जत और मान-सम्मान से देखा नहीं जाता, जिसके वह हकदार हैं।
इन सबके बावजूद, किसान अपने सपनों और आशाओं को नहीं छोड़ता। वह हर साल इस उम्मीद में बीज बोता है कि शायद अगला साल बेहतर होगा। लेकिन जब सूखा, बाढ़ या कीट उसके खेतों को बर्बाद कर देते हैं, तो उसकी उम्मीद भी टूटने लगती है। आत्महत्या की घटनाएं इसी टूटती उम्मीद का प्रमाण हैं।
अब समय आ गया है कि समाज और सरकार दोनों इस सच्चाई को समझें। किसानों के लिए केवल योजनाएं बनाने से कुछ नहीं होगा; उनकी जरूरतों और समस्याओं को समझकर उनका समाधान ढूंढना होगा। खेती की लागत को कम करना, दलाली को खत्म करना, फसल बीमा योजनाओं को सरल बनाना और फसल के उचित दाम सुनिश्चित करना—ये कुछ ऐसे कदम हैं जो किसान की स्थिति को सुधार सकते हैं।
आज यह सवाल हम सबके सामने खड़ा है: आखिर वह दिन कब आएगा जब हमारे अन्नदाता को भूखे पेट सोने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी? जब तक यह सवाल अनुत्तरित रहेगा, तब तक हमारी विकास यात्रा अधूरी ही रहेगी।
