एन0के0शर्मा
इतिहास अब झूठ नहीं बोला जा रहा—वह सिखाया जा रहा है कि झूठ को ही सच मान लिया जाए।
यह कोई अकादमिक भूल नहीं, यह एक सुनियोजित अपराध है।
यह किताबों की गलती नहीं, यह सत्ता की मंशा है।
और सबसे खतरनाक बात यह है कि यह अपराध बिना खून बहाए हो रहा है—इसलिए इसे अपराध मानने से भी इनकार कर दिया गया है।
जब किसी समाज की स्मृति को नियंत्रित कर लिया जाता है, तब उसे हथकड़ियाँ पहनाने की आवश्यकता नहीं रहती। वह स्वयं को ही दोषी मानने लगता है। यही इतिहास के पुनर्लेखन का अंतिम उद्देश्य है—एक ऐसा नागरिक पैदा करना जो गुलामी को प्रगतिशीलता और आत्मविस्मृति को बौद्धिकता समझे।
आज इतिहास को मिटाया नहीं जा रहा—उसे इस तरह तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है कि सत्य भी अपनी पहचान खो दे। आक्रांता ‘सुधारक’ बन जाता है, पीड़ित ‘असहिष्णु’ कहलाने लगता है, और जिसने सभ्यता रची—उसे ‘मिथक’ के कब्रिस्तान में दफना दिया जाता है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है; यह सभ्यताओं की हत्या है।
इतिहास लेखन अब शोध नहीं रहा—यह नैरेटिव इंजीनियरिंग है। चुनिंदा घटनाओं को उभारकर, असुविधाजनक सत्य को सिलेबस से बाहर फेंककर, और प्रश्न पूछने वालों को ‘कट्टर’, ‘राष्ट्रवादी’, या ‘अवैज्ञानिक’ घोषित करके एक ऐसा बौद्धिक वातावरण रचा गया है जहाँ सत्य बोलना ही अपराध बन गया है। विश्वविद्यालय अब ज्ञान के मंदिर नहीं, बल्कि वैचारिक प्रशिक्षण शिविर बनते जा रहे हैं।
भारतीय संदर्भ में यह पुनर्लेखन एक खुला बौद्धिक आक्रमण है। यहाँ समस्या यह नहीं कि इतिहास गलत लिखा गया—समस्या यह है कि जानबूझकर इस तरह लिखा गया कि भारत को अपराधी और उसके विध्वंसकों को उद्धारक सिद्ध किया जा सके। वैदिक और पौराणिक परंपराओं को ‘कथा’ कहकर खारिज किया गया, लेकिन वही परंपराएँ यदि ग्रीक या नॉर्डिक होतीं तो ‘दार्शनिक विरासत’ कहलातीं। यह दोहरा मापदंड नहीं—यह बौद्धिक नस्लवाद है।
इतिहास के इस विकृत संस्करण का सबसे घातक प्रभाव यह है कि नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों पर गर्व नहीं, शर्म सिखाई जाती है। उन्हें बताया जाता है कि उनके पूर्वज अंधविश्वासी थे, कि उनकी परंपराएँ दमनकारी थीं, कि उनका ज्ञान उधार का था। यह आत्मालोचना नहीं—यह आत्महत्या की शिक्षा है। कोई भी समाज जो अपनी जड़ों से नफरत करना सीख ले, उसे गिराने के लिए किसी शत्रु की आवश्यकता नहीं रहती।
यहाँ एक और भयावह सच्चाई है—इतिहास का पुनर्लेखन अब राज्य तक सीमित नहीं रहा, यह बाज़ार और एल्गोरिद्म का साझा प्रोजेक्ट बन चुका है। जो इतिहास क्लिक लाता है, वही दिखाया जाता है। जो सत्ता के लिए सुविधाजनक है, वही ट्रेंड करता है। सर्च इंजन तय करते हैं कि कौन-सा अतीत ‘वैध’ है और कौन-सा ‘अप्रासंगिक’। सत्य अब प्रमाण से नहीं, दृश्यता से तय हो रहा है। जो बार-बार दिखेगा—वही सच होगा, भले ही वह आधा हो, झूठा हो या जानबूझकर विकृत किया गया हो।
इतिहास के इस अपहरण को अक्सर ‘समावेशी दृष्टिकोण’ या ‘नई व्याख्या’ का नाम दिया जाता है। लेकिन प्रश्न यह है—क्या हर नई व्याख्या प्रगति होती है?
यदि नई व्याख्या सभ्यताओं को अपराधी और आक्रांताओं को नायक बना दे,
यदि नई व्याख्या आत्मसम्मान को आत्मग्लानि में बदल दे,
यदि नई व्याख्या प्रश्न पूछने की क्षमता ही छीन ले—
तो वह व्याख्या नहीं, वैचारिक दमन है।
सत्ता जानती है कि इतिहास पर नियंत्रण लोकतंत्र से भी बड़ा हथियार है। कानून बदले जा सकते हैं, सरकारें बदली जा सकती हैं—लेकिन यदि जनता की स्मृति बदल दी जाए, तो विद्रोह की संभावना ही समाप्त हो जाती है। इसलिए इतिहास को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि नागरिक या तो भ्रमित रहे, या अपराधबोध में डूबा रहे, या इतना थका हुआ कि प्रश्न पूछने की ऊर्जा ही न बचे।
यह संघर्ष अतीत को लेकर नहीं है—यह भविष्य को लेकर युद्ध है। जो समाज अपने इतिहास की रक्षा नहीं करता, वह अपने भविष्य की शर्तें स्वयं तय नहीं कर सकता। वह दूसरों के लिखे पाठ्यक्रम में जीता है, दूसरों के अपराधों का बोझ ढोता है, और दूसरों की परिभाषाओं में अपनी पहचान खोजता है।
अब प्रश्न यह नहीं है कि इतिहास कैसे लिखा जाए।
प्रश्न यह है कि क्या समाज अपनी स्मृति पर संप्रभुता चाहता है या नहीं।
क्योंकि जिस दिन स्मृति पूरी तरह सत्ता के अधीन हो जाती है, उस दिन नागरिक केवल शासित नहीं होता—वह यह भी भूल जाता है कि कभी उसने सोचना, प्रश्न करना और विरोध करना भी जाना था।
और तब इतिहास केवल पुनर्लिखा नहीं जाता—
वह स्थायी रूप से लूट लिया जाता है।
