जन्माष्टमी पर विशेष  कृष्ण की आत्मकथा 

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जन्माष्टमी पर विशेष  कृष्ण की आत्मकथा

एन0के0शर्मा
मेरे प्रिय समाज के मित्रों! मैं *श्री कृष्ण हूँ। मूढ़ जगत आज मेरा जन्म दिवस मना रहा है। जबकि सबको पता है कि मै जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हूँ। संपूर्ण ब्रह्माण्ड तो मुझसे जन्म पाता है और मुझमें ही लय भी हो जाता है? फिर मैं कब और कहाँ से जन्मा? ब्रह्माण्ड मेरे मुख में और काल मेरी मुट्ठी में बंद हैं। मैं देवदूत नहीं , स्वयं देव हूँ , साक्षात् ब्रह्म हूँ मैं। कृष्ण जैसे मेरे कई स्थूल रूप हैं। तुम्हें तुम्हारी महत्ता का बोध कराने एवं तुम्हारा मार्गदर्शन करने के लिये मैं बार-बार तुम्हारे बीच आता हूँ। अर्जुन का मार्गदर्शन करने के लिए भी मैं उसी मार्गदर्शक गुरु रूप में आया था। गीता की ज्ञान गंगा मेरी वाणी का व्यापक संस्करण है।
चूंकि तुममें भी आत्मा बनकर मैं ही निवास करता हूँ, क्योंकि मैं परमात्मा हूँ। इस संबंध से तुम सब मेरे सगोत्री परिजन हो। मैं जगत के साथ ‘रास’ करता हूँ। केवल तुम्हीं नहीं चराचर का प्रत्येक अणु-परमाणु मेरी इच्छानुसार नाचता है। अकेला मैं जब सृष्टि के अनंत अस्तित्व के साथ रास करता हूँ, “तब नटराज शिव भी इसे देखने के लोभ में कैलाश छोड़कर चले आते हैं। क्योंकि वो नटराज और मैं नटवर हूँ । मैं ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ गुरु हूँ, तभी तो ऋषि-महर्षि, देवर्षि सभी नि:संकोच कहते हैं –
*गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु साक्षात् परंब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः।”*
आत्मा-परमात्मा के बीच अटूट संबंध के कारण मैं तुम सबका प्रथम मित्र हूँ। एक ऐसा मित्र जिसे तुम केवल विश्वास एवं श्रद्धा से पा सकते हो। सुदामा, द्रौपदी, गजराज व अर्जुन से लेकर सूरदास, मीरा व रसखान तक, जिसने जब भी पुकारा मैं अविलंब उपस्थित हुआ हूँ। यदि नहीं गया तो तुम्हारे कर्म या पुकारने में कोई त्रुटि रही होगी। वर्ना मेरे लिए तो धरती पर कर्म ही प्रधान है। मैं आदर्श प्रेमी भी हूँ। सृष्टि में ‘प्रेम’ मेरा सबसे व्यापक स्वरूप है, जिस रूप में राधा, मीरा और रसखान जैसे भक्तों ने मुझे पहचाना एवं समर्पित हो गए। इन सबने मुझे पाया भी।
संसार के सभी कार्यों का मैं ही कर्ता हूँ, कार्यों के कारण भी मेरे ही अधीन होते हैं। परन्तु कर्म करने का अधिकार तुम्हारे पास और उसका परिणाम मेरी मुठ्ठी में होते हैं, क्योंकि मैं परम पुरुष हूँ। परिणाम तुम्हारे वश में नहीं होने के कारण ही ‘अनिश्चित या भाग्य’ है और मै ‘भाग्य-विधाता’ हूँ। कर्म-फल का भोग तुम्हारी विवशता है जिसको तुम मेरा छल समझ कर मुझे ‘छलिया’ कहते हो। वैसे जान लो “कि छल करना भी मेरा आरक्षित अधिकार है। क्योंकि मैं सर्वशक्तिमान हूँ।”
मैं ब्रह्माण्ड की आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार तुम्हारे धर्म का निर्धारण करता हूँ। परन्तु तुमने अपने स्वार्थ को ही धर्म बना लिया है। तुम मूर्ख भी हो, तभी तो मुझसे मिलने के लिये उपहार और पैरोकार के साथ आते हो । मैं पूछता हूँ, ” कि क्या तुम कभी अपने घर में बाहरी हस्तक्षेप सहन करोगे ?” नहीं न ? मैं भी पंडा जैसे बिचौलिए को अपने व तुम्हारे बीच पसंद नहीं करता। स्वयं मुझे छलिया का अलंकरण भी साधारण नहीं सक्षम लोगों ने ही दिया है। क्योंकि वो मेरा या अपने भाग्य के छल यानि प्रारब्ध का सामना नहीं कर सकते थे। यदि मैं वो छलिया हूँ, तो भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, जरासंध, भूरिश्रवा, शिशुपाल और जयद्रथ जैसे लोगों ने ही नहीं, कर्ण जैसे दानवीर पराक्रमी योद्धा ने भी मेरे छल का स्वाद चखा है। इन भाग्यशालियों का मैंने पापमोचन किया। परंतु साक्षात् ब्रह्म होते हुए भी ‘महात्मा कर्ण’ की हत्या के बाद मैं स्वयं जगत नियंता कृष्ण भी अपराधबोध से सिहर उठा था। सुदामा को दयनीय दशा में देखने जैसी पीड़ा ही मुझे कर्ण के शव को देखकर भी हुई थी। क्योंकि परम नि:स्वार्थी कर्ण ने मित्रता निभाने में मुझे कई-कई बार परास्त किया था।
” मैंने तो सुदामा को केवल त्रिलोक का वैभव ही दिया था, परंतु दानवीर कर्ण ने तो दुर्योधन की मित्रता पर अपनी यश-कीर्ति व प्राण सबकुछ लुटा दिया। उस आदर्श पुरुष की पवित्र काया के अंतिम संस्कार हेतु धरती पर मैं कोई पवित्र स्थान नहीं ढूंढ पा रहा था। तब उसके पार्थिव शरीर को अपनी भुजा पर जलाकर मैंने उस महात्मा को श्रद्धांजलि दी। जो धरती पर परमपुरुष के प्रायश्चित का एकमात्र उदाहरण है।
अब तो तुम जान गए होगे कि मुझे अपने सत्कर्मों के बल से कभी भी विवश किया जा सकता है ?
जब तुम सबकुछ समझ गए , तब मैं तुमसे कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ। सही उत्तर दोगे तो तत्काल स्वर्ग में एक आरक्षित भवन तुम्हें निःशुल्क दे दूंगा।
प्रश्न -1: मुझे यादव या यदुवंशी कहकर क्षुद्र क्यों बनाते हो ? आर्यावर्त में स्थापित वर्ण व्यवस्था का सर्वनाश करके कुत्सित जाति व्यवस्था का प्रणेता द्रोण क्या मुझसे पहले जन्मा था ?
प्रश्न – 2: जब मैं , द्रौपदी , गजराज , मीरा एवं सूरदास जैसों द्वारा स्मरण करने मात्र से आ सकता हूँ , तो तुम लाउडस्पीकर-डी0जे0 पर चिल्लाकर ध्वनिप्रदूषण क्यों फैलाते हो ?
प्रश्न – 3: जब सारे जंगल-उपवन काटकर रिहायशी काॅलोनी बना डालोगे तो मेरे साथ रास कहाँ करोगे ?
•÷○ इति ○÷•
सत्यमेव जयते

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