पल्लवी मुखर्जी
तुम प्रेम में हो
या तुम
प्रेम करते हो
या फिर
सीखते हो प्रेम—
जैसे
सीखता है एक जुलाहा
करघे पर कपड़ा बुनना,
या
सीखता है कुम्हार
चाक पर घड़ा बनाना,
जबकि उसकी दृष्टि
टिकी रहती है
चाक की धुरी पर।
पर
गौरैया की आँखों में देखो—
प्रेम से लबालब भरी
वे आँखें
तुम्हें
छलकती हुई मिलेंगी।
उसके पास है
वह ऊष्मा,
जितनी चाहिए
प्रेम के लिए।
गौरैया
प्रेम की तलाश में
पूरा जंगल नहीं नापती।
वह तो
बस ठहर जाती है—
और प्रेम
किसी नन्हे छौने की तरह
चलकर
उसके पास आ जाता है।
और तुम?
तुम जगा देते हो
उसे भी
जो प्रेम की गहरी नींद में है,
जिसकी मुंदी पलकों में
अब भी कैद है
गौरैया का प्रेम—
होंठों पर प्यास
और
जंगल का हरियाता संगीत।
इन दिनों
गौरैया
किसी दूर देश में नहीं,
हमारे ही आसपास
गुम होने के कगार पर है।
प्रेम का हो रहा है बलात्कार—
जैसे
जंगल में
पेड़ कट रहे हों
धड़ाधड़!
