संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर प्रश्न: क्या वैश्विक संस्थाएं निष्प्रभावी हो चुकी हैं?

राष्ट्रिय

एन0के0शर्मा
द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद जब मानवता ने अपने ही रक्त से इतिहास को लिखा, तब 1945 में एक ऐसी संस्था की परिकल्पना की गई थी जो शक्ति के अंधे उन्माद पर नैतिक नियंत्रण स्थापित करेगी। उसी स्वप्न से जन्म हुआ संयुक्त राष्ट्रों का। उद्देश्य स्पष्ट था—युद्ध रोकना, शांति स्थापित करना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और राष्ट्रों को संवाद की मेज पर लाना। किंतु सात दशकों बाद यह प्रश्न असहज रूप से सामने खड़ा है: क्या यह संस्था आज भी उतनी ही प्रभावी है, या वह महाशक्तियों की राजनीति के बीच प्रतीकात्मक मंच बनकर रह गई है?
संयुक्त राष्ट्र की संरचना में ही शक्ति-संतुलन की विडंबना निहित है। सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य—संयुक्त राज्य, रूस, चीन, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस—वीटो अधिकार से लैस हैं। यह अधिकार शीतयुद्ध की भू-राजनीति की उपज था, परंतु 21वीं सदी की बहुध्रुवीय दुनिया में यही वीटो बार-बार वैश्विक सहमति को अवरुद्ध करता दिखता है। जब किसी मानवीय संकट पर प्रस्ताव महाशक्तियों के हितों से टकराता है, तो निर्णय प्रक्रिया ठहर जाती है। शांति की अपीलें जारी रहती हैं, पर युद्धभूमि पर गोलियाँ चलती रहती हैं।
यूक्रेन संकट, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, अफ्रीका के गृहयुद्ध, एशिया-प्रशांत की सामरिक प्रतिस्पर्धा—इन सभी संदर्भों में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका सीमित, प्रतिक्रियात्मक और अक्सर असहाय प्रतीत हुई है। महासभा में पारित प्रस्ताव नैतिक समर्थन अवश्य देते हैं, किंतु उनके अनुपालन का दायित्व उन्हीं राष्ट्रों पर है जो राजनीतिक हितों से प्रेरित हैं। परिणामस्वरूप वैश्विक व्यवस्था का प्रहरी स्वयं शक्तियों के संतुलन का बंधक बन जाता है।
मानवाधिकार परिषद, शांति-रक्षक बल और विभिन्न एजेंसियाँ—इन सबने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया है। परंतु जब प्रश्न निर्णायक राजनीतिक हस्तक्षेप का आता है, तब संयुक्त राष्ट्र अक्सर “संवाद मंच” भर रह जाता है, निर्णायक शक्ति नहीं। यह स्थिति केवल संरचनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है। संयुक्त राष्ट्र एक ऐसे समय में बना था जब राष्ट्र-राज्य विश्व-व्यवस्था के निर्विवाद केंद्र थे। आज वैश्विक शक्ति का स्वरूप बदल चुका है—बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, क्षेत्रीय संगठन, सैन्य गठबंधन और वित्तीय नेटवर्क समानांतर प्रभाव रखते हैं। संस्था की संरचना 1945 की है, पर दुनिया 2026 की।
सबसे बड़ा प्रश्न प्रतिनिधित्व का है। क्या अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया की आकांक्षाएँ सुरक्षा परिषद में पर्याप्त रूप से परिलक्षित होती हैं? विश्व की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा उन राष्ट्रों में निवास करता है जिनके पास वीटो नहीं है। भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, जापान जैसे देशों की स्थायी सदस्यता की माँग दशकों से लंबित है। यदि वैश्विक दक्षिण स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से वंचित महसूस करता है, तो संस्था की वैधता पर प्रश्न स्वाभाविक है।
आर्थिक प्रतिबंधों और शांति-स्थापना अभियानों की प्रभावशीलता भी बहस का विषय है। प्रतिबंध अक्सर नागरिकों को अधिक प्रभावित करते हैं, जबकि सत्ता-प्रतिष्ठान सुरक्षित रहते हैं। शांति-रक्षक बल कई बार सीमित अधिकारों और संसाधनों के कारण निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर पाते। इससे यह धारणा बलवती होती है कि संयुक्त राष्ट्र नैतिक घोषणाएँ तो कर सकता है, पर शक्ति-राजनीति को नियंत्रित नहीं।
फिर भी, क्या इसका अर्थ यह है कि संयुक्त राष्ट्र पूर्णतः निष्प्रभावी हो चुका है? उत्तर उतना सरल नहीं। जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट, मानवीय सहायता, शरणार्थी संरक्षण—इन क्षेत्रों में वैश्विक समन्वय का कोई अन्य व्यापक मंच उपलब्ध नहीं है। महामारी के समय सहयोग, विकास कार्यक्रमों के माध्यम से सहायता, और अंतरराष्ट्रीय कानून का संरक्षण—ये सब इस संस्था की अनिवार्यता को दर्शाते हैं। समस्या संस्था के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक जड़ता और राजनीतिक निर्भरता में है।
वास्तविक संकट प्रासंगिकता का नहीं, विश्वास का है। जब राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को अपने हितों के अनुसार स्वीकार या अस्वीकार करते हैं, तब संस्था की नैतिक शक्ति क्षीण होती है। यदि सुधार नहीं हुए—विशेषकर सुरक्षा परिषद के विस्तार और वीटो प्रणाली की पुनर्समीक्षा—तो भविष्य में वैकल्पिक क्षेत्रीय मंच और गठबंधन उभर सकते हैं, जो संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीयता को चुनौती देंगे।
21वीं सदी की विश्व-व्यवस्था बहुध्रुवीय, जटिल और त्वरित है। ऐसे समय में एक वैश्विक संस्था की आवश्यकता पहले से अधिक है, परंतु वही संस्था यदि अतीत की संरचनाओं में जकड़ी रहे, तो वह भविष्य का नेतृत्व कैसे करेगी? संयुक्त राष्ट्र को या तो अपने ढाँचे और निर्णय-प्रक्रिया में साहसिक परिवर्तन करने होंगे, या वह धीरे-धीरे प्रतीकात्मक आदर्श में परिवर्तित हो जाएगा—सम्मेलनों और प्रस्तावों तक सीमित।
इतिहास का यह क्षण निर्णायक है। यदि संयुक्त राष्ट्र स्वयं को पुनर्परिभाषित करता है—प्रतिनिधित्व का विस्तार, पारदर्शिता की वृद्धि और शक्ति-संतुलन का यथार्थवादी पुनर्गठन—तो वह पुनः वैश्विक नैतिकता का केंद्र बन सकता है। अन्यथा, आने वाली पीढ़ियाँ इसे एक ऐसे आदर्श के रूप में देखेंगी जो महान था, आवश्यक था, पर समय के साथ स्वयं को बदलने का साहस नहीं जुटा सका।

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