एन0के0शर्मा
बीसवीं सदी का शीत युद्ध परमाणु हथियारों और वैचारिक ध्रुवीकरण का था; इक्कीसवीं सदी का संघर्ष अदृश्य है — कोड की पंक्तियों, चिप की परतों, डेटा के प्रवाह और एल्गोरिद्म की संरचनाओं में छिपा हुआ। आज विश्व की दो महाशक्तियाँ — चीन और संयुक्त राष्ट्र— तकनीकी वर्चस्व की ऐसी प्रतिस्पर्धा में उलझी हैं, जो सीमा विवादों से कहीं अधिक गहरी और दूरगामी है। प्रश्न यह नहीं कि कौन जीतेगा; प्रश्न यह है कि इस डिजिटल द्वंद्व में भारत कहाँ खड़ा है।
तकनीक अब केवल सुविधा का माध्यम नहीं रही; यह सामरिक शक्ति का मूलाधार बन चुकी है। 5G नेटवर्क, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला और साइबर क्षमताएँ — ये सभी आधुनिक राष्ट्र-शक्ति के स्तंभ हैं। जिस देश के पास डेटा, डिज़ाइन और वितरण का नियंत्रण होगा, वही वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा निर्धारित करेगा।
5G का संघर्ष केवल तेज़ इंटरनेट का प्रश्न नहीं है। यह भविष्य के औद्योगिक ऑटोमेशन, स्वायत्त वाहनों, स्मार्ट शहरों और सैन्य संचार की रीढ़ है। Huawei (हुआवेई) के उभार ने पश्चिमी जगत को चौंकाया। अमेरिकी प्रतिबंधों और निर्यात नियंत्रणों के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट संकेत दिया कि तकनीकी अवसंरचना को राष्ट्रीय सुरक्षा से अलग नहीं देखा जा सकता। परिणामस्वरूप 5G केवल व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संरेखण का पैमाना बन गया।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की होड़ और भी तीव्र है। AI आज युद्ध-नीति, निगरानी, आर्थिक पूर्वानुमान और सूचना-प्रबंधन का औजार है। OpenAI जैसे संस्थान जहाँ एल्गोरिद्मिक नवाचार को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं चीन की राज्य-समर्थित रणनीति विशाल डेटा-संग्रह और निगरानी-आधारित मॉडल को प्रोत्साहित करती है। यहाँ मूल संघर्ष केवल तकनीकी नहीं, वैचारिक भी है — खुली व्यवस्था बनाम नियंत्रित डिजिटल संप्रभुता।
परंतु इस अदृश्य युद्ध का वास्तविक रणक्षेत्र सेमीकंडक्टर है। माइक्रोचिप वह ‘नया तेल’ है, जिस पर पूरी डिजिटल सभ्यता टिकी है। ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका की कंपनियाँ उन्नत चिप निर्माण में अग्रणी हैं, जबकि चीन आत्मनिर्भरता की दिशा में तीव्र निवेश कर रहा है। अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों ने चीन की उच्च-स्तरीय चिप तक पहुँच सीमित करने का प्रयास किया, जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला में तनाव बढ़ा। यह स्पष्ट हो चुका है कि चिप निर्माण पर नियंत्रण, भविष्य की सैन्य और आर्थिक क्षमता का निर्धारक होगा।
साइबर जासूसी और डिजिटल हस्तक्षेप इस संघर्ष का सबसे धुंधला किन्तु खतरनाक पक्ष है। विद्युत ग्रिड, बैंकिंग नेटवर्क, रक्षा संचार और चुनावी प्रणालियाँ — सभी संभावित लक्ष्य हैं। आरोप-प्रत्यारोपों के बीच यह निर्विवाद है कि साइबर हमले अब युद्ध की औपचारिक घोषणा के बिना भी राष्ट्रों को पंगु बना सकते हैं। इस संदर्भ में 21वीं सदी का युद्ध ‘हाइब्रिड’ है — जिसमें मिसाइल से अधिक प्रभावी मालवेयर हो सकता है।
इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत की स्थिति जटिल किंतु संभावनाओं से भरी है। एक ओर भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना — आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर — के माध्यम से एक अनूठा मॉडल प्रस्तुत किया है, जो विकासशील विश्व के लिए उदाहरण बन सकता है। दूसरी ओर सेमीकंडक्टर निर्माण में भारत अभी प्रारंभिक चरण में है और उच्च-स्तरीय विनिर्माण के लिए विदेशी निवेश व तकनीकी साझेदारी पर निर्भर है।
रणनीतिक रूप से भारत ने संतुलन साधने की नीति अपनाई है। वह क्वाड जैसे मंचों पर अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, किंतु चीन के साथ प्रत्यक्ष आर्थिक संबंध भी पूरी तरह विच्छेदित नहीं किए हैं। यही संतुलन भारत की कूटनीतिक कुशलता की परीक्षा है। यदि भारत केवल एक ध्रुव की परिधि में सिमटता है, तो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता सीमित हो सकती है; किंतु यदि वह तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में तीव्र कदम नहीं उठाता, तो वह वैश्विक आपूर्ति शृंखला का मात्र उपभोक्ता बना रहेगा।
AI और डेटा के क्षेत्र में भारत के पास विशाल मानव संसाधन और बाजार है। परंतु डेटा-संरक्षण कानून, साइबर सुरक्षा अवसंरचना और अनुसंधान निवेश को और सुदृढ़ करना होगा। विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र और रक्षा अनुसंधान के बीच समन्वय अनिवार्य है। यदि भारत डिजाइन, एल्गोरिद्म और हार्डवेयर निर्माण के त्रिकोण में संतुलन स्थापित कर सका, तो वह केवल ‘डिजिटल बाजार’ नहीं, ‘डिजिटल शक्ति’ बन सकता है।
यह संघर्ष पारंपरिक शीत युद्ध जैसा नहीं है; यहाँ वैचारिक दीवारें कम, पर तकनीकी अवरोध अधिक हैं। व्यापार, निवेश और ज्ञान-विनिमय पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, पर नियंत्रण और प्रतिबंधों की दीवारें ऊँची होती जा रही हैं। इसे “नया शीत युद्ध” कहना आकर्षक हो सकता है, किंतु वास्तविकता अधिक जटिल है — यह परस्पर निर्भरता के बीच प्रतिस्पर्धा का युग है।
अंततः प्रश्न यही है: क्या भारत इस अदृश्य युद्ध में दर्शक रहेगा या निर्णायक खिलाड़ी बनेगा? सीमा पर सैनिक सजग हैं, पर साइबर सीमा पर प्रहरी कौन है? आने वाले दशक यह तय करेंगे कि भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता, नवाचार और रणनीतिक संतुलन के माध्यम से वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित कर पाता है या नहीं।
इक्कीसवीं सदी की असली लड़ाई टैंकों से नहीं, ट्रांजिस्टर से लड़ी जाएगी — और जो राष्ट्र इस सत्य को शीघ्र समझ लेगा, वही भविष्य का शिल्पकार होगा।
