बेटी हैं रिश्तो की डोर

Video News

बेटी हैं रिश्तो की डोर

ज़ब होता है घर में बेटियों का आगमन, वसुंधरा-सा महक उठता हमारा घर आंगन।

घर में जब भी कोई होती है हलचल। उसके आने से ही होती है चहल-पहल।

बेटियों के पग होते हैं खुशियों का आधार। तभी तो महक उठते हैं हमारे घर-संसार।

ममता रुपी माँ बन हमें प्यार हैं लुटाती,जब गलती करें हम पास हमें है बिठाती।

बहन, बेटी, पत्नी व माँ का ऐसा होता स्थान, परिवार इन्हें ही देता वह जबरदस्त सम्मान।

कन्या ही हर रूपों में देती है सब संस्कार। मुसीबत में घिर जाओ तो करती बेड़ा पार।

जब होता कोई विवाद डट करती है सामना। इन्हें ही आता है रिश्तो की डोर को थामना।

संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इंदौर (मध्यप्रदेश)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *